रविवार, 30 अक्तूबर 2011

सिद्धांत रहस्यं


॥ सिद्धांत रहस्यं ॥


श्रावण स्यामले पक्षे एकादश्यां महानिशि ।
साक्षात् भगवता प्रोक्तं तदक्षरश उच्यते ॥१॥

(श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की महारात्रि को स्वयं भगवान द्वारा मुझसे कहे गए वचनों को अक्षरशः कहता हूँ॥१॥)

ब्रह्म सम्बंध करणात् सर्वेषां देहजीवयोः ।
सर्वदोषनिवृत्तिर्हि दोषाः पञ्चविधाः स्मृताः ॥२॥

(ब्रह्म सम्बन्ध रूपी साधन से सभी जीवधारियों के समस्त दोषों का नाश हो जाता है जो स्मृतियों में पाँच प्रकार के कहे गए हैं॥२॥)

सहजा देशकालोत्था लोकवेदनिरूपिताः ।
संयोगजाः स्पर्शजाश्च न मन्तव्याः कथन्चन ॥३॥

(सामान्य, स्थान और समय से सम्बंधित, समाज और वेदों में वर्णित, संयोग और स्पर्श से होने वाले, इनमें से किसी को अपने में न मानते हुए अपना साधन करते रहना चाहिए॥३॥)

अन्यथा सर्वदोषाणां न निवृत्तिः कथन्चन ।
असमर्पितवस्तुनां तस्माद्वर्जनमाचरेत् ॥४॥

(किसी अन्य प्रकार से समस्त दोषों का नाश संभव नहीं है, अतः जो कुछ भी प्रभु को समर्पित नहीं किया गया है उसका बहिष्कार करना चाहिए॥४॥)

निवेदिभिः समर्प्यैव सर्वं कुर्यादिति स्थितिः।
न मतं देवदेवस्य सामिभुक्तं समर्पणं ॥५॥

(प्रार्थना करते हुए समस्त वस्तुओं को मुझे समर्पित करना चाहिए। किसी अन्य देवता को अर्पित की गयी वस्तु मुझे समर्पित नहीं करनी चाहिए॥५॥)

तस्मादादौ सर्वकार्ये सर्ववस्तु समर्पणम् ।
दत्तापहारवचनं तथा च सकलं हरेः ॥६॥

(अतः सभी कार्यों के प्रारंभ में ही समस्त वस्तुएं प्रभु को समर्पित करनी चाहिए। श्रीहरि को समर्पित सभी कुछ उनका ही है अतः उन दी हुई वस्तुओं को-॥६॥)

न ग्राह्ममिति वाक्यं हि भिन्नमार्गपरं मतम् ।
सेवकानां यथालोके व्यवहारः प्रसिध्यति ॥७॥  

(अपने प्रयोग में नहीं लाना चाहिए यह वाक्य दूसरे मतावलंबियों के अनुसार ही सत्य है(पुष्टिमार्ग के अनुसार नहीं)। सेवकों का जो आचरण समाज में प्रसिद्ध है उसी का अनुसरण करते हुए ॥७॥)

तथा कार्यं समर्प्यैव सर्वेषां ब्रह्मता ततः ।
गंगात्वं सर्वदोषाणां गुणदोषादिवर्णना।
गंगात्वेन निरूप्या स्यात्तद्वदत्रापि चैव हि ॥८॥

(और सभी कार्यों को प्रभु को ही समर्पित करने से वे प्रभु जैसे ही पवित्र हो जाते हैं। जिस प्रकार गंगा में मिलने से सभी प्रकार का जल पवित्र होकर गंगात्व को प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिए॥८॥)

1 टिप्पणी:

आशा ने कहा…

गहन अर्थ हैं |
आशा